KRIYA

Friday, 22 September 2017

Blue effulgence, God in creation, Krishna consciousness, during meditation on 22/09/2017 at 0700Hrs.

Blue effulgence, God in creation, Krishna consciousness, during meditation on 22/09/2017 at 0700Hrs.  Devotees Sarat and Kameswari from USA.
Pse see the transfer of energy (Shaktipath) from K.Markandeya Sastry.

















Tuesday, 9 May 2017

Books available written by me:



Books available written by me:
Shrushti Janma Saadhana(Hindi) Rs.70/-
Krishna Kriya Kaivalya(English, Hindi)  150-00
Jyotishya vastu Rudraksha kriya Kundalinee(English & Telugu) Rs.070-00
Geeta Antarartham(Telugu), Vemana oka kriyayogi Rs.200-00
Kriyayoga-moodavanetramu
Sri Lalita mariyu Vishnu sahasranamamulu(Telugu) Rs.200-00
Kriyas DVD(Hindi) Rs.200-00 
Ramayanayam Bharatam Ashtadasa Puranamulu (Telugu) Rs.200-00
Anatomy Kriyayoga(English & Telugu) Rs.200-00  


Prem & OM,    
K.M.Sastry, Kriya Yoga Dhyanamandir, Ramalayam St, DN76, Devinagar,RK Puram Gate,  Hyderabad 500056, Andhra Pradesh, India.
Prem & Om     KM Sastry
 PH; 09440364947, 09440364945, 08500289974     
 Email: dhyanamandir@gmail.com                  
Blog address: htpp://kriyayogasadhana.blogspot.in/                


Thursday, 2 February 2017

ध्यान पद्धति



ध्यान पद्धति
मुद्राये बंधों
यह मुद्राए व्यक्ति मे प्रवाहित प्राणशक्ति को भौतिक नसो (nerves) द्वारा अवयवों मे ले जाती है और तंदुरुस्ती प्रदान करती है।  यह शरीर को भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक समतुल्यता मे रखती है। एक टन(one ton)  सिद्धांतों की तुलना मे एक औंस (one ounce practice) अभ्यास उत्तम है। इसीलिए सभी की तंदुरुस्ती के लिये अभ्यास योग्य है यह मुद्राए।
1) खेचरी मुद्रा: कूटस्थ मे दृस्टि स्थिर कर के आँखें खोल के या बंद कर के तालु मे जीभ को रख के प्राणायाम क्रिय करना
2) भूचरी मुद्रा: अर्ध मीलित नेत्रों से दृस्टि को नाक के उपर रखना
3) मध्यम मुद्रा: कूटस्थ मे दृस्टि स्थिर कर के आँखो और कानों को बंद कर के प्राण शक्ति को अंतः कुंभक करना
4) शांभवि मुद्रा : पद्मासन या सुखासन मे बैठ कर कुंभक करना और ध्यान करना
सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाएशेष अंगुलिया सीधी रखेंकूटस्थ मे दृष्टि रखे! मन को जिस चक्र मे ध्यान कर रहे है उस चक्र मे रखिए और उस चक्र पर तनाव डालिए! पूरब दिशा अथवा उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठिए! शरीर को थोडा ढीला रखीए! खेचरी मुद्रा में रहिये!
मूलाधार में 4 बार, स्वाधिष्ठान में 6 बार, मणिपुर में 10 बार, अनहता में 12 बार, विशुद्ध में 16 बार, आज्ञा नेगटिव में18 बार, आज्ञा पाजिटिव में 20 बार, अन्तः कुंभक (Fission) और बाह्य कुंभक(Fusion) कीजिए!

अंगुली
तत्व
रुग्मता निवारण 
अंगुष्ठ
परमात्माका प्रतीक है! अग्नि (रूप) तत्व
दुर्बल जीर्णशक्ति, मोटापन
तर्जनी
आत्मा का प्रतीक है! वायुतत्व (स्पर्श)
चर्मरोग, पार्किन्सन (Parkinson)
मध्यम
आकाश तत्व(शब्दं)
कान का संबधित रोग निवारण
अनामिक
पृथ्वी तत्व (गंध)
व्याधि निरोधाकशक्ति में बलहीनता का निवारण
कनिष्ट
जल(रस)
रक्त हीनता, अरुचि

         अभय मुद्रा छोडके बाकी मुद्राये कम से कम 20 मिनट कीजिये!
ध्यानामुद्राए  से मानसिक प्रशांति, शांति, मुख में कांति, कुण्डलिनी जाग्रति करना होजायेगा!

प्राण मुद्रा:
कनिष्ठा तथा अनामिका अंगुलियों के अग्रभाग को अंगुठें के अग्रभाग से मिलाएहर दिन प्रातः तथा सायम संध्या समाया में 25 मिनट करने से 
शरीर की दुर्बलता दूर करना, मन की शांति, आंखों के दोषों को दूर करना, शरीर की रोगनिरोधक शक्ति बढाना, विटमिनो की कमी को दूर करना, थकान दूर करना शरीर और आँखों की चमक बढती है        
 
अपान मुद्रा:
तर्जनी अंगुली को अंगुठें के मूल मे लगाऐ, मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को अंगुठें के अग्रभाग से मिलाऐ
हृदय को ताकत मिलती है, दिल का दौरा पडते ही तुरंत यह मुद्रा करने से आराम मिलता है, सिरदर्द, दमे के शिकायत को ठीक करना, उच्च रक्तचाप(high blood pressure)मे फायदा होना।


  लिंगमुद्रा
 

मुट्ठी बाँधे और अंदर के अंगुठें को खडा रखे, अन्य अंगुलियों को बंधी हुई रखे
गर्मी बढाना, सर्दी, जुकाम, दमा, खाँसी, सायनस, और निम्न रक्तचाप (low Blood Pressure) मे फायदा होना।
 ज्ञान मुद्रा
अंगुठें को तर्जनी अंगुली के सिरे से लगा देशेष तीन अंगुलिया सीधी रखें
स्मरण शक्ति वृद्धि,  ज्ञान की वृद्धि, पढने मे मन लगना, मस्तिष्क के स्नायु मजबूत होना, सिरदर्द दूर होना, अनिद्रा का नाश, स्वभाव परिवर्तन, अभ्यास शक्ति आना, क्रोध का नाश।
 शून्य मुद्रा

मध्यमा अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाएशेष अंगुलिया सीधी रखें
 कान नाक और गले के रोगों को दूर करना  (Removes all types of  ENT problems), मसूढे की पकड मजबूत करना और थाँयराईड रोग मे फायदा होता है।
  वायुमुद्रा
 


तर्जनी अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ
के मूल मे लगाए और दबाएशेष अंगुलिया सीधी रखें
 
वायु शाँति, लकवा, सयटिका, गठिया, संधिवात, घुटने के दर्द मे फायदा, गर्दन के दर्द मे फायदा., रीढ के दर्द मे फायदा, और पार्किसंस रोग मे फायदा (Parkinson's disease) होता है।
 अग्निमुद्रा


अनामिका अंगुली को मोडकर अंगुष्ठ के मूल मे लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें।
शरीर संतुलित होना, वजन घटना, मोटापा कम होना, उष्णता वृद्धि,   कोलोस्ट्रोल मे कमी   (control bad Cholesterol), मधुमेह और लिवर रोग मे फायदा (Diabetes and Liver-related problems), तनाव मे कमी (body tension )    
 पृथ्वीमुद्रा
     
अनामिका अंगुलि को अंगुष्ठ से लगायें और दबाएशेष अंगुलिया सीधी रखें
 शरीर मे स्फूर्ति , काँति और तेजस्विता आना, दुर्बल को मोटा बनाना, वजन बढाना, जीवनी शक्ति वृद्धि, दिमाग मे शांति और विटमिनो की कमी को दूर करना  
वरुणमुद्रा  

कनिष्ठा  अंगुलि को अंगुष्ठ से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें।
रूखेपन की कमी और चिकनायी मे वृध्दि, चर्म मे मृदुत्व होना, मुँहासों को नष्ट करना और चहरे मे सुंदरता का बढाना रक्त विकर और जलतत्व की कमी से उत्पन्न रोगों को दूर करने मे लाभकारी है
अभय मुद्रा:
शांति और सौभाग्य से वर्धिल्ल होने के लिए बड़े लोग अपना आशीस देते है इस मुद्रा का माध्यम से!
मेरुदंड मुद्रा:
मेरुदंड को सीदा रखा के कमर का दर्द में उपशमन देता है!
चारों अँगुली मोड़ के मुट्ठी बाँध के अंगुष्ट को सीदा रखना चाहिए!

आदिमुद्र!
फेफडों में श्वास भरके रक्त को शुद्दी करता है!
अंगुष्ट को बाँधा के शेष चारों अँगुली उस का उप्पर से मुट्ठी बाँध के रखना है!
अंजली मुद्र:
कानो को दबाता हुआ दोनों हाथ सीदा रखना है!

गले का बाधा निवारण करता है!

अंकुश मुद्र:
मध्यमा अँगुली को सीदा रखा के शेष अंगुलियाँ दबाके मोड़ के रखना है!
एकाग्रता और आँखों का बाधा निवारण के लिए अच्छी है!

जलधारानाशक मुद्र:
कनिष्ट से अंगुष्ट का मूल का दबा के रखना, शेष अंगुलियों सीदा रखना!
नाक से पानी अना (Running nose), अतिसार (diarrhea), मोटापन (Obesity) निवारण!
मकरमुद्र:
गुर्दा (kidney), Jigar(लीवर) पीड़ित लोगों के लिए अच्छा है!
एक हथेली (palm) का अनामिका और कनिष्ट का बीच में दूसरा हाथ का हथेली (palm) का अंगुष्ट को रखना है! अब पहला हथेली (palm) का अंगुष्ट को दूसार हाथ का अनामिका साथ दबाके रखना है!
शक्तिमुद्र:
दोनों हाथो का हथेली (palm) का कनिष्ट और अनामिका  मिलाना है! नाखुनवाला अंगुष्ट मध्यम और तर्जनियों को मिलाके दबाके सीदा रखना है!
नाभी का नीचे का नसों को बलोपेत करेगा! स्त्रीओं का  ऋतुबाधायें (menstruation problems) को सुधारेगा!
पृष्ठ मुद्र
कमर दर्द के लिए अच्छा मुद्रा है!
बाए हाथ अंगुष्ट का मध्यभाग में नाखूनवाला तर्जनी का साथ दबाके रखना है! शेष अंगुलियाँ सीदा रखना है! दाए हाथ अंगुष्ट  मध्यमा और नाखूनवाला कनिष्ट भागो को दबाके रखना है! शेष अंगुलियाँ सीदा रखना है!
 

चिन्मुद्र
ज्ञानमुद्र को उलटा करके रखने से चिन्मुद्र होजायेगा! यह ध्यानमुद्रा है!
रक्तदाब(blood pressure)निवारण, सकारात्मक विचारे लाने में सहायता करना, स्मृति शक्ति में बढ़ाव(improves memory power), पैरों में पानी(edema) बीमारी को सुधारेगा, फेफड़ों में श्वास भरके रक्त को शुद्ध करना! 

चिन्मय मुद्र
तर्जनी नाखूनवाला भाग और अंगुष्ट नाखूनवाला भाग दोनों मिलाके दबाके रखना का चाहिए! शेष अंगुलियाँ हथेली (palm) को दबाके रखना चाहिए! दोनों हथेलीं (palm) को दोनों पैर का घुटनों का उप्पर रखना चाहिए!
फेफड़ों में श्वास भरके रक्त को शुद्धी करना! हृदय के लिए अच्छा है! यह ध्यानमुद्र है!

 
ब्रह्म मुद्र
अंगुष्ट को मोडके शेष अंगुलियाँ का साथ मिलाके मुट्टी बनाना है! ऐसा दोनों हाथ नाभी का नीचे रख के दबाके रखना चाहिए!
फेफड़ों में श्वास भरके रक्त को शुद्धी करना! हृदय के लिए अच्छा है! यह ध्यानमुद्र है!


भैरव मुद्र
बाए हथेलीं (palm) को दाए हथेलीं (palm) का उप्पर रखना है!
दाए हथेलीं (palm) का उप्पर बाए हथेलीं (palm) रखने से भैरवी मुद्र होगा!
मन को निश्चल करेगा! नाड़ियों को बलोपेट करता है! यह ध्यानमुद्र है!
   बुद्धि मुद्र
यह ध्यानमुद्र है!
बाए हथेलीं (palm) का उप्पर दाए हथेलीं (palm) रखना है!
दोनों अंगुष्ठों मिलाके उप्पर की ओररखना है! 
  ध्यानमुद्र
बाए हथेलीं (palm) का उप्पर दाए हथेलीं (palm) रखना है!
दोनों अंगुष्ठों मिलाके नाभी का नीचे दबाके रखना है!
योनिमुद्र

यह ध्यानमुद्र है!
दोनों हथेलीं (palm) एक दूसरे का साथ जैसा दिखाया ऐसा दबाके रखना है!
दोनों अंगुष्ठों का नाखूनवाला भाग मिलाके नाभी का नीचे दबाके रखना है!
कुंडलिनी मुद्र है! यह ध्यानमुद्र है!
दोनों हाथों को मुट्ठीभर के रखना है! एक दूसरे का नीचे नाभी का नीचे रखना है!


 
गरुड मुद्र
श्वास रोगों और पक्षवात का निवारण करता है!
दोनों हथेलीं (palm) खोल के रखना है! दोनों अंगुष्ठों एक दूसरे का साथ पकड के रखना है!
गोमुख मुद्र   यह ध्यानमुद्र है!
दोनों हथेलीं (palm) एक का उप्पर एक रखना है! दोनों अंगुष्ठों एक दूसरे का साथ पकड के रखना है!
पागलपन, हिस्टीरिया (hysteria), आलसीपन, क्रोध, डिप्रेशन (dippression) इत्यदि रोगों में शांति, और प्राणशक्ति में बढ़ाव!
 

 कैलास मुद्र   यह ध्यानमुद्र है!
नमस्कार स्थिति में दोनों हाथो को शिर का उप्पर रखना है!

.
 खेचरी मुद्र  यह ध्यानमुद्र है!
जीब को मोड़ के पीछे ताळु में रखना है!
यह क्रियायोग साधक के लिए अति मुख्य मुद्र है!
साधना में निद्रा भूक और प्यास नहीं लगेगा!


कुंभमुद्र   यह ध्यानमुद्र है!
दोनों हथेलीं (palm) का अंगुलियाँ एक दूसरे में बाँध के रखना है! दोनों अंगुष्ठों खडा कर रखना है!

  
 नागमुद्र   यह ध्यानमुद्र है!
 दोनों हथेलीं (palm) एक का उप्पर एक रखना है! दोनों अंगुष्ठों कैची (scissors) जैसा रखना है!

 वायन/ वातकारक मुद्र
तर्जनी मध्यम और अंगुष्ठ तीनों का नाखूनवाला भाग दबाके रखना है, शेष अंगुलियाँ खडा करके रखना है!
पेचिश(dysentery), sunstroke, मोटापन(obesity) के लिए अच्छा मुद्र है!
 पूषुणी मुद्र
ए सर्वरोग निवारिणी मुद्र है!
अपान मुद्र वायन मुद्र और प्राणमुद्र तीनों मिलाके पूषुणी मुद्र कहते है!
ये तीनों मुद्राये दस दस मिनट के लिए एक का बाद एक डालने से बहुत फायदा है!
शांभवी मुद्र,  यह ध्यानमुद्र है!
कूटस्थ में मन और दृष्टि लगा के ध्यान करना है!





मांडूक मुद्र
यह ध्यानमुद्र है!
दोनों हथेलीं (palm)का अंगुलियाँ एक का उप्पर एक रखना है! दोनों अंगुष्ठों एक दूसरे का उप्पर रखना है!
पागलपन, हिस्टीरिया (hysteria), आलसीपन, क्रोध, डिप्रेशन (dippression) इत्यदि रोगों में शांति, और प्राणशक्ति में बढ़ाव!










प्रारम्भ में शक्तिपूरक अभ्यास का प्रार्थना करना चाहिए!
हे परमपिता, आप ही मेरे इस शरीर को स्थितिवंत करते है! मेरे अंदर चेतना पूर्वक आरोग्य, इच्छा, स्फूर्ति, और सिद्धि जागृती कीजिए! मेरा शरीर और मन सदैव नित्य यौवन रहनेदे! ॐ शांति, ॐ शांति, ॐ शांति!
12 times ॐकार करो!
इस पश्चात् ध्यान उपक्रमण करने से पहले इस प्रार्थना को करे!     
                        प्रार्थना
ब्रह्मानंदम परमसुखदम केवलं ज्ञान मूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमश्याधि लक्ष्यम् 
एकं नित्यं विमलं अचलं सर्वधि साक्षी भूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितम् सद्गुरुम् तम् नमामि! 
हे परमपिता, जगन्माता, बंधु-सखा, प्रियतम प्रभु, भगवान श्रीकृष्ण, जीसस क्रैस्त, महावतार बाबाजि, लाहिरी महाशय महाराज, ञानावतार श्रीयुक्तेस्वर स्वामीजि, प्रेमावतार प्रियगुरु परमहंस श्री योगानन्द स्वामीजि, तथा सभी धर्मो के ऋषि मुनियोँ, मै आप सभी को प्रणाम करता हूँ!
असतोमा सद्गमय, तमसोमा ज्योतिर्गमय, म्रुत्योर्मा अम्रुतम् गमय!
हे परमपिता, आपके प्रेम की ज्योति मेरे ह्रुदय मे सदैव प्रज्वलित रहे और मै इस प्रेम को सभी के ह्रुदयों मे जाग्रुत कर सकू ! आप मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार करे!
इस के पश्चात 3 times ॐकार कीजिए!
गुरुर् ब्रह्मा गुरुर विष्णुह गुरुर् देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मैश्री गुरवेनमः
3 times ॐकार करो!
अब ध्यान कि प्रक्रिया शुरू करें!
1) अनुष्ठान गायत्री:

सीधा वज्रासन, पद्मासन अथवा सुखासन मे ज्ञानमुद्रा लगाके बैठिए! अनामिका अंगुलि के आग्रभाग को अंगुष्ठ के आग्रभाग से लगाए और दबाए। शेष अंगुलिया सीधी रखें। गर्दन सीदा रखे! कूटस्थ व सहस्रार मे दृष्टि रखें! अब गर्दन को अधिचेतानावस्था में रखें!  
गायंतं त्रायते इति गायत्री
इस मंत्र जितना समय गायेगा इतना लाभदायक है और रक्षा करता है!
ॐ भूर्भुवस्वः तत्सवितर्वरेण्यं
भर्गो देवशय धीमहि धीयोयोंनः प्रचोदयात्
= परमात्मा, भूः= आप प्रणव स्वरुप है, भुवः= दुःख नाशकारी है, स्वः=सुख स्वरुप है, तत्= ओ, सवितुः= तेजस यानी प्रकाश रूपी, देवशय=भगवान का, वरेण्यं= श्रेष्ठमय, भर्गः=पापनाशक प्रकाश को, धीमहि=ध्यान करेंगे, यः= जो, नः= हमारा, धियः=बुध्धों को, प्रचोदयात= प्रेरेपण करेंगे! 
तात्पर्य:-- परमात्मा, आप प्रणव स्वरुप है, दुःख नाशकारी है, सुख स्वरुप है, ओ,  तेजस यानी प्रकाश रूपी,  भगवान का,  श्रेष्ठमय, पापनाशक प्रकाश को, ध्यान करेंगे, जो, हमारा,  बुध्धों को, प्रेरेपण करेंगे! 
पूरक=श्वास को अंदर लेना, अंतःकुम्भक= श्वास को कूटस्थ में रोख के रखना, रेचक= श्वास को बाहर निकाल्देना, बाह्यकुम्भक= श्वास को शारीर के बाहर रोक के रखना है!
एक पूरक, अंतःकुम्भक , रेचक, और बाह्यकुम्भक, सब मिलाके एक हंसा कहते है!
मन में गायत्री मंत्र बोल्ते हुये एक दीर्घ हंस करना है!
पूरक, अंतःकुम्भक, रेचक, और बाह्यकुम्भक इन चारों समानाप्रतिपत्ति में होना चाहिए!
इस प्रकार 12 बार करना चाहिए!
तत् पश्चात हु हूँ क्रिया करना चाहिए!
2) हु (tense) हूँ (relax):
अब हु करके छोटा, और  हूँ करके लंबा श्वास नाक से लेना चाहिए! यानी पूरक करना चाहिए! पूरक करते समय करतल (palm) को आस्ते आस्ते मोड़ना चाहिए!
अब 3 व 4 सेकंड्स रोकना है! यानी अंतःकुम्भक करना चाहिए!
अब ह करके छोटा, और  हां  करके लंबा श्वास नाक से बाहर छोड़ना चाहिए! यानी रेचक करना चाहिए! रेचक करते समय करतल (palm) को आस्ते आस्ते खोलना चाहिए!
अब 3 व 4 सेकंड्स रोखना है! यानी बाह्य कुम्भक करना चाहिए!
इस प्रकार 12 बार करना चाहिए!
तत् पश्चात हम सा क्रिया करना चाहिए!

3) हम् सा क्रिया:

प्रथम में प्रयास से श्वास मेरुदंड का मूलाधारचक्र से आज्ञा पाजिटिव (कूटस्थ) चक्र तक लाना  है, और 2 व 3 सेकंड्स का पश्चात कूटस्थ से मूलाधारचक्र से शारीर का बाहर वापस जाएगा!   मन में कहते हुए पूरकं करना, कूटस्थ में श्वास को रोख के रख के अंतःकुम्भक करना, मन और दृष्टि को कूटस्थ में ही रखना, रोखा हुआ श्वास को सा कहते हुए छोड़णा यानी रेचक करना!
मन और दृष्टि आवक जावक श्वास का अनुसरण करना चाहिए!
प्रथम दफा ही कूटस्थ में श्वास को रोख के रख के अंतःकुम्भक करना, तत् पश्चात श्वास अपने आप अंदर आना और अपने आप बाहर जाने देना! श्वास को प्रयत्नपूर्वक कूटस्थ में श्वास को रोक के नहीं रखना है! श्वास जो चक्र तक आएगा और जो चक्र तक जाके रुकेगा सिर्फ देखना ही है!   
ऐसा पूरक और रेचकों में श्वास को अवलोकन के समय में अंतर्मुख होंकर समाधि लभ्य होने से उस आनंद में बाहर आने तक बैठना चाहिए! 

3) हम् सा क्रिया:

प्रथम में प्रयास से श्वास मेरुदंड का मूलाधारचक्र से आज्ञा पाजिटिव (कूटस्थ) चक्र तक लाना  है, और 2 व 3 सेकंड्स का पश्चात कूटस्थ से मूलाधारचक्र से शारीर का बाहर वापस जाएगा!   मन में कहते हुए पूरकं करना, कूटस्थ में श्वास को रोख के रख के अंतःकुम्भक करना, मन और दृष्टि को कूटस्थ में ही रखना, रोखा हुआ श्वास को सा कहते हुए छोड़णा यानी रेचक करना!
मन और दृष्टि आवक जावक श्वास का अनुसरण करना चाहिए!
प्रथम दफा ही कूटस्थ में श्वास को रोक के रख के अंतःकुम्भक करना, तत् पश्चात श्वास अपने आप अंदर आना और अपने आप बाहर जाने देना! श्वास को प्रयत्नपूर्वक कूटस्थ में श्वास को रोक के नहीं रखना है! श्वास जो चक्र तक आएगा और जो चक्र तक जाके रुकेगा सिर्फ देखना ही है!   
ऐसा पूरक और रेचकों में श्वास को अवलोकन के समय में अंतर्मुख होंकर समाधि लभ्य होने से उस आनंद में बाहर आने तक बैठना चाहिए!
4) ॐकार सुनने क्रिया:
दोनों आँखें, नाक, कानों, और मुह को दोनों हाथों की अंगुलियों से बंद कर के कूटस्थ में मन और दृष्टि निमग्न कीजिए! इसी को योनी मुद्रा कहते है!
अब मन ही मन लंबा सा अपना सामर्थ्य के अनुसार  कहिए! अन्तःकुम्भक करके कूटस्थ में मन और दृष्टि निमग्न करना है! अपना सामर्थ्य के अनुसार श्वास को रोक के रखना, अब श्वास को बोल्तेहुवे रेचक करके बाह्यकुम्भक करके कूटस्थ में मन और दृष्टि निमग्न करना है! अपने सामर्थ्य के अनुसार श्वास को रोक के रखना है!
सिर में अन्तःकुम्भक और बाह्यकुम्भक करते समय में ॐकार सुनने का प्रयत्न करे! ॐकार सुनाई देनेसे उसी पवित्र शब्द में ममैक होना चाहिए!

अब महामुद्रा करना है!
क्रियाये करना है!
ज्योतिमुद्र करना है!
अब ध्यान करना है!
ध्यान का अर्थ:
अधिचेतानावस्था में शाम्भवी मुद्रा में कूटस्थ में मन और दृष्टि लगा के बैठना है! लंबा श्वास लेके अन्तः कुम्भक करना है! अपना सामर्थ्य का अनुसार श्वास को कूटस्थ में रोकके रखना है!
शब्द सुनाईदेने से शब्द में प्रकाश दिखाईदेने से प्रकाश में एकाग्रता रखना है! दोनों केलिए प्रयत्न नहीं करना चाहिए!
वैसा ही निश्वास करके बाह्य कुम्भक करना है! अपना सामर्थ्य का अनुसार श्वास को बाहर में रोकके रखना है!
शब्द सुनाईदेने से शब्द में प्रकाश दिखाईदेने से प्रकाश में एकाग्रता रखना है! दोनों केलिए प्रयत्न नहीं करना चाहिए!
वैसा करते हुए क्रमशः समाधि स्थिति लभ्य करना है! 

                        निरोग काया के लिये प्रार्थना
हे परमपिता, आप सर्वव्यापी है! आप अपनी सभी संतानो मे विद्यमान है! अपनी आरोग्यदायिनी उपस्थिति को उनके शरीर् मे प्रकट करे, 
हे परमपिता, आप सर्वव्यापी है! आप अपनी सभी संतानो मे विद्यमान है! अपनी आरोग्यदायिनी उपस्थिति को उनके मन मे प्रकट करे,
हे परमपिता, आप सर्वव्यापी है! आप अपनी सभी संतानो मे विद्यमान है! अपनी आरोग्यदायिनी उपस्थिति को उनके आत्मा मे प्रकट करे, 
विश्व शांति और विश्व मानव सौभ्रात्रुत्व के लिये ओम्

हे परमपिता, आप अपनी विश्वशक्ति का माध्यम से शक्ति पूरण करने प्रक्रिया द्वारा शरीर का स्वास्थता लाने का पद्धति हमे को सिखावो  
हे परमपिता,  धारणा और प्रसन्नता प्रक्रियों द्वारा मन् का स्वास्थता लाने का पद्धति हमे सिखावो
हे परमपिता, आप का उप्पर ध्यान नाम का दिव्य औषधि से आत्म विषयैक अज्ञान रुग्मता को सजाव करने का पद्धति हमे सिखावो

ॐजयजगदीशहरे,स्वामीजयजगदीशहरे |
भक्तजनोंकेसंकट,क्षणमेंदूरकरे |ॐजयजगदीशहरे ||
जोध्यावेफलपावे,दुःखबिनसेमनका,स्वामीदुःखबिनसेमनका |
सुखसम्पतिघरआवे,सुखसम्पतिघरआवे,कष्टमिटेतनका |ॐजयजगदीशहरे ||
मातपितातुममेरे,शरणपडूकिसकी,स्वामीशरणपडूमैंकिसकी |
तुमबिनऔरनदूजा,प्रभुबिनऔरनदूजा,आसकरूंमैंजिसकी | ॐजयजगदीशहरे || तुमपूरणपरमात्मा,तुमअन्तर्यामी,स्वामीतुमअन्तर्यामी|
पारब्रह्मपरमेश्वर,पारब्रह्मपरमेश्वर,तुमसबकेस्वामी |ॐजयजगदीशहरे ||
तुमकरुणाकेसागर,तुमपालनकर्ता,स्वामी तुमपालनकर्ता
मैंमूरखफलकामीमैंसेवकतुमस्वामी,कृपाकरोभर्ता |ॐजयजगदीशहरे ||
तुमहोएकअगोचर,सबकेप्राणपति,स्वामीसबकेप्राणपति,
किसविधिमिलूंदयामय,किसविधिमिलूंदयामय,तुमकोमैंकुमति | ॐजयजगदीशहरे ||
दीन-बन्धुदुःख-हर्तातुमरक्षकमेरे,स्वामीरक्षकतुममेरे |
अपनेहाथउठाओ,अपनेशरणलगाओद्वारपड़ातेरे |
ॐजयजगदीशहरे ||
विषय-विकारमिटाओ,पापहरोदेवा,स्वमीपापहरोदेवा,
श्रद्धाभक्तिबढ़ाओ,श्रद्धाभक्तिबढ़ाओ,सन्तनकीसेवा |
ॐजयजगदीशहरे  ||
तन मन धन है तेरा सब कुछ है तेरा
तेरा सब कुछ तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा
ॐजयजगदीशहरे ||

उपनिषद् प्रार्थना :---
ॐ सर्वेषाम् स्वस्तिर्भवतु ॐ सर्वेषाम् शांतिर्भवतु
ॐ सर्वेषाम् पूर्णंभवतु ॐ सर्वेषाम् मंगळंभवतु
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः  ॐ सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
ॐ सर्वे सन्तु निरामयाः मा कश्चित् दुःख भाग् भवेत्
ॐ असतोमा सद्गमय तमसोमा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मा अमृतं गमय
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्ण मुदच्युते
पूर्णश्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यतु
ॐ शान्तिः ॐ शान्तिःॐ शान्तिः
ॐ नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वा पुनस्च भूयोपि नमो नमस्ते
नमःपुरस्ताधतपृष्ठतस्थे नमोस्तुते सर्वता एव सर्वं 
ॐ शान्तिः ॐ शान्तिःॐ शान्तिः